2.किसी शीशे की भाँति टूटते, सपने तो क्या ग़म है
मुकद्दर ग़र नहीं है साथ में, अपने तो क्या ग़म है
सभी मशगूल हैं औरों की, खुशियाँ छीन लाने में
किसी की बेबसी गऱ पास, हम रख लें तो क्या ग़म है

किसी मज़लूम के आँसू, की कीमत खाक समझेंगे
किसी खामोश से दिल की, ये हसरत खाक समझेंगे
कभी मंदिर कभी मस्जिद यहीं, बस काम इनका है
सियासतदाँ किसी मजबूर, की गत खाक समझेंगे

नये युग का चलो मिलकर, सभी आगाज करते हैं
वो जो सहमी सी है अरसे,से वो आवाज करते हैं
ये मजहब की अकड़ लेकर, भला कब तक जिऐंगे हम
यतीमों को हँसी देकर, खुद(ही) पे नाज करते हैं

रहें खामोश ग़र हरदम, तो सब बुज्दिल समझते हैं
 बहुत कुछ बोलना चाहें, तो चुप रहने को कहते हैं
मुझे हस्ती बचाने की, यहीं तरकीब सूझी हैं
कभी मुँह खोल लेते हैं, कभी खामोश रहते हैं।

ये खामोशी जो हम दोनों, के बीचों बीच बसती है
तुम्हारी और मेरी बेबसी, पर खूब हँसती है
ये धागा जो जमाने को, नहीं देता दिखाई है
टिकी इसके रहम पर आज, हम दोनों की हस्ती है

 

 

 

रचनाकार-दीपक कविया

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