याद कीजिए कुछ ही अरसे पहले का घटनाक्रम, नेहरू-गांधी परिवार से सम्बद्ध लेखिका नयनतारा सहगल का अकादमी पुरस्कार लौटाना। संदर्भ दिया गया नोएडा के दादरी गाँव में हुई अखलाक की नृशंस हत्या का। कन्नड़ लेखक कलबुर्गी की चरमपंथियों द्वारा की गई हत्या का संदर्भ भी गाहे-बगाहे जोड़ दिया गया। जैसा कि हर बार होता है, इस लोकप्रिय बहस को नाम मिला ‘असहिष्णुता’ के विरुद्ध बुद्धिजीवी वर्ग का आक्रोश। फिर तो पुरस्कार लौटाने की होड़ सी मच गई। कई गुमनाम लेखकों को देश की अवाम ने पहली बार जाना। बुद्धिजीवी बिरादरी में वामपंथी विचारकों के बाहुल्य ने स्वाभाविक दक्षिणपंथी प्रतिक्रिया को जन्म दिया। फिल्म जगत की राय भी बंटी हुई नजर आई। लेखकों का पुरस्कार लौटाना एक सांकेतिक विरोध था किंतु जैसे-2 बहस आगे बढी, जनमानस भी ध्रुवीकृत होने लगा और ‘intolerance’ शब्द हर किसी की जुबान पर चढ गया। सोशल मीडिया अखाड़े में बदला और मीडिया को बैठे-2 मनचाहा मसाला मिल गया। निजी चैनलों पर शोरगुल से लदी बेफिजूल की बहसों का दौर चला। उन ‘वर्चुअल खिड़कियों’ में बैठे भिन्न-2 पंथों के रहनुमाओं और उनके तर्कों ने अवाम का मनोरंजन भी बखूबी किया। मुफ्त की पाकिस्तान-यात्रा फिर से शुरू की गई। बहस का अंत नजदीक आते-2 मूल विषय गौण हो चुका था। अर्थहीन विमर्श और कुतर्क-प्रधानता के इस दौर में बहस के सार्थक अंत की उम्मीद करना भी बेमानी था। बहरहाल, असहिष्णुता का चैप्टर या यूं कहें खेल समाप्ति की और आया। पर्दा गिरते ही विजयश्री का सेहरा अपने-2 सर पर बांधने के लिए दोनो प्रधान पंथो और उनके अनुसरण का ढोंग करने वाले दलों के बीच कुश्ती शुरू हुई। कुतर्कशक्ति में माहिर सभी दलों के प्रवक्ताओं ने विरोधी विचारधाराओं के एक्सपोज होने का दम भरा। आम सहमति यह थी कि वामपंथ(अथवा गैर-दक्षिणपंथ) का पलड़ा थोड़ा भारी रहा। इस सहमति के गर्भ में बिहार विधानसभा के परिणाम भी थे जहाँ भाजपा को पराजय का मुँह देखना पड़ा।
यह शोर पूरी तरह थमा भी नहीं था कि नेपथ्य में एक अलग तरह की आवाज गूंजने लगी। चूँकि यह आवाज देश के सर्वाधिक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में से एक और बुद्धिजीवियों के गढ माने जाने वाले जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से आई थी अत: हलचल होना स्वाभाविक था। राष्ट्रीय राजधानी की घटना होने के अपने अलग मायने होते हैं(और ऐसी घटनाओं पर राजनीतिक मतांतर के अपने निहितार्थ भी) अत: मीडिया घरानों की रेस भी देखने लायक थी।’सूत्रों’ द्वारा प्रदत सामग्री किसी राष्ट्रविरोधी कृत्य अथवा उद्बोधन का संकेत दे रही थी अत: मीडिया का अति-उत्साह कोई आश्चर्यजनक घटना नहीं थी। एक-दूसरे को कुचलकर आगे बढने को आतुर निजी चैनलों के कैमरे किसी ओलिंपिक इवेंट का प्रभाव पैदा कर रहे थे। सबसे पहले घटनाक्रम कवर करने की होड़ में सार्थक पत्रकारिता कही पीछे छूट चुकी थी और ऐसा पहली बार नहीं था। पत्रकारिता लोकतंत्र को शर्मसार होने के मौके वक्त-2 पर देती रही है। बहरहाल, वामपंथ के गढ माने जाने वाले जेएनयू के छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया और उसके कथित साथी उमर खालिद का अनौपचारिक राष्ट्रविरोधी उद्बोधन और उनके साथियों द्वारा की गई भड़काऊ नारेबाजी की खबर जंगल की आग की तरह फैली। मीडिया-ट्रायल शुरू हुआ, उदारवाद और चरमपंथ के बीच फिर से तलवारें खिंच गईं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पैरोकारों ने जहाँ अफजल-समर्थक नारों और कश्मीर की आजादी की मांग संबंधित कथित घटना को कानून के दायरे में रखकर देखने की पैरवी की तो संघ-समर्थकों ने इसे राष्ट्रद्रोह का सीधा-2 मामला बताकर कन्हैया और खालिद को हाफिज सईद और अलगाववादी ताकतों से जोड़ा। वामपंथ के प्रति घृणा का वातावरण बनने लगा जिसके केन्द्र में जेएनयू का कथित वामपंथी चरित्र और वहाँ वक्त-2 पर होने वाले राजनीतिक संवाद की कथित राष्ट्रविरोधी और नक्सल समर्थक प्रवृति थी। आरएसएस और जेएनयू का वैचारिक विरोध नया नहीं है, किन्तु इस विरोध को पहली बार केन्द्रीय मंच इसी घटना से मिला है। चूँकि राष्ट्रविरोध जनभावना को आंदोलित करने वाला व भावनात्मक मुद्दा है अत: दक्षिणपंथियों को किसी भी सीमा तक जाकर वामपंथ का विरोध करने का मानो सर्टिफिकेट सा मिल गया। Intolerance वाले प्रकरण में तथाकथित धर्मनिरपेक्ष जमात ने जिस अंदाज में तथाकथित राष्ट्रवादियों को आड़े हाथों लिया था कुछ उसी या शायद उससे भी उग्र रूप में राइट विंग के सैनिकों ने वामपंथियों से निपटने का मन बनाया है। मीडिया भी दो-फाड़ हो चुका है, एक हिस्सा वो है जो राष्ट्रदोह के मामले पर अपना फैसला दे चुका है और अब IB के इनपुट्स के आधार पर गिरफ्तार छात्रों को आतंकवाद समर्थक साबित करने की तैयारी में है। मीडिया का दूसरा हिस्सा कथित वामपंथी-झुकाव वाला है। इस भाग का प्रयास भी अपने आप में अनूठा है। इन मीडिया चैनलों की मुख्य बहस कथित वीडियो के असली या नकली होने के इर्द-गिर्द घूम रही है। कन्हैया की पेशी के दौरान पत्रकारों पर हुए हमले पर भी इन चैनलों के पत्रकार चिंतित दिखाई पड़ते हैं। एक तीसरा अल्पसंख्यक हिस्सा भी है जो अपनी पत्रकारिता को दोनों चरम पक्षों से दूर रखने का प्रशंसनीय प्रयास कर ईमानदार और निष्पक्ष पत्रकारिता की उम्मीद रूपी लौ को जलाए हुए है। मीडिया से पूर्णतया निष्पक्ष होने की उम्मीद निरर्थक है, विशेषकर भारत के संदर्भ में जहाँ लगभग सभी मीडिया घराने औद्योगिक हितों की चादर ओढे हुए हैं। मीडिया भी व्यक्तियों का ही समूह है जिनका विचारधारात्मक झुकाव लोकतंत्र और विविधता की भावना के लिए सुखद ही है बशर्ते यह शुद्ध पत्रकारिता की कीमत पर न हो। राजदीप व बरखा का वामपंथी रूझान उतना ही सामान्य और स्वीकार्य है जितना सुधीर व रोहित का दक्षिणपंथ के प्रति लगाव। उनकी पत्रकारिता में यदा-कदा दिखने वाला विचारधारा का पुट तब तक स्वीकार्य है जब तक बरखा दत दंगाईयों को हिन्दू चरमपंथियों के रूप में न चिन्हित करे न ही सुधीर चौधरी राष्ट्रहित से उपर औद्योगिक हित को प्राथमिकता दे। पूर्णता का आग्रह तो सर्वथा बुरा व त्याज्य है क्योंकि यह कुंठा को जन्म देता है। सर्वकालिक महानतम ‘विचारक’ अल्बर्ट आईंन्सटाइन एक सदी पहले ही इस अवधारणा को पुष्ट कर चुकें है कि निरपेक्षता का अस्तित्व नहीं है। जेएनयू विवाद के संदर्भ में इस अवधारणा को देखा जाए तो तस्वीर साफ होने लगती है। अभी दक्षिणपंथ सापेक्ष रूप से हावी है वहीं वामपंथी हाशिए पर हैं। होना भी चाहिए, विचारधारा की आड़ में देश विभाजक नारे लगाना वो भी आतंकियों का गुणगान करने की सीमा तक, एक सभ्य समाज किसी भी कीमत पर इसे नकारेगा। वामपंथियों को विरोध का सामना करना पड़ रहा है, इसके पीछे उनका Absolutism के प्रति आग्रह ही है जिसके फलस्वरूप जेएनयू परिसर में संसद हमले के गुनहगार को शहीद बताया गया। दक्षिणपंथी संगठन(विशेषकर भाजपा) वही गलती दोहरा रहे हैं जो उनके विरोधियों ने की। कोर्ट परिसर में पत्रकारों पर हमला (जिनमें महिला पत्रकार भी शामिल थीं) इसी छद्म-राष्ट्रवादिता के प्रदर्शन की बानगी है। बुराई न दक्षिणपंथ में है न वामपंथ में। बुराई इन दोनों विचारधाराओं के चरम स्वरूपों में है। चरम होने पर पूर्णता का दंभ स्वतः ही आ जाता है। यही दंभ हिटलर में जर्मन आर्यों की श्रेष्ठता को लेकर आया था। इसका परिणाम क्या हुआ इतिहास जानता है। अगर सरल शब्दों में कहें तो गोधरा की भयावहता किसी भी तरह नंदीग्राम से कम अथवा अधिक नहीं है। दंगों के संबंध में क्रिया-प्रतिक्रिया की दक्षिणपंथी व्याख्या मुझ जैसे अल्पज्ञानी के लिए उतनी ही अजीब है जितनी नक्सल हमलों को आदिवासी संघर्ष के नाम पर उचित ठहराने की वामपंथी व्याख्या। भारत की पब्लिक वाकई विवेकशील है। जयहिंद, जयभारत!

पुन:श्च :- असहिष्णुता पर चली बहस के दौरान जेएनयू के बहुचर्चित प्रोफेसर और मशहूर इतिहासकार इरफान हबीब द्वारा की गई संघ और बर्बर आतंकी संगठन ISIS की तुलना और आजकल स्वयंभू ‘देशभक्तों’ द्वारा की जा रही वामपंथियों और आतंकियों के मध्य तुलना को अगर ध्यान से विश्लेषित किया जाए तो दोनों ही विचारधाराओं और उनके ‘छद्म-पैरोकारों’ का दोगला चरित्र सामने आता है।

लेखक- दीपक कविया

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